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क्यों है कुमाऊं में वसंत पंचमी का खास महत्व !

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  अपनी समृद्ध संस्कृति, वैभवशाली परम्पराओं, अभूतपूर्व प्राकृतिक सौंदर्य के लिए उत्तराखंड देश में ही नहीं अपितु समस्त वि में प्रसिद्ध है। यहां के तीज त्योहारों में भी प्रकृति प्रेम और सद्भाव की भावना झलकती है। बसंत पंचमी का त्यौहार उत्तराखंड में प्रकृति प्रेम और आपसी सद्भाव के रूप में मनाया जाता है। बसंत पंचमी फूलों के खिलने और नई फसल के आने का भी त्योहार है। इस दिन दान और स्नान का विशेष महत्त्व है। स्थानीय नागरिक अपनी पवित्र नदियों में स्नान या अपने आसपास के प्राकृतिक जल श्रोतों में स्नान करने जाते हैं। फिर गाय के गोबर से घर की लिपाई पोताई कर, घर के मुख्य दरवाजे में सरसों के पीले फूल डालें जाते हैं। कुमाऊं में बसंत पंचमी के त्यौहार को ‘जौ त्यार’ के नाम से भी जाना जाता है। जौ इस समय नई फसल होती है इसलिए घर के दरवाजों के किनारों पर भी जौ की पत्तियां लगाई जाती हैं। जौ को सुख और समृद्धि का प्रतीक भी माना जाता है। इसलिए इसे देवताओं से लेकर घर में सभी सदस्यों के सिरों में भी इन्हें शुभाशीष  के तौर पर रखा जाता है। इस दिन घर में खास पकवान भी बनाये जाते हैं।  इस वर्ष बसंत पंचमी ...

कहीं नैनीताल भी स्मृतियों में ही शेष ना रह जाए?

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याद आता है 2002 या 2003 का वह समय जब टिहरी बांध बन रहा था और पुरानी टिहरी से लोग अपने डूबते घरों को छोड़ने को विवश हो रहे थे। वही हालात आज फिर जोशीमठ के रोते बिलखते परिजनों को देखकर महसूस किया जा सकता है। बड़ा कठिन होता है उस जगह को छोड़ना जहां हम पैदा हुए, बचपन गुजरा, जवानी बीती और अब बुढ़ापा गुजार रहे हों। यह सिर्फ एक व्यक्ति की संवेदना नहीं! यह परिवार, कुटुंब, रिश्ते नाते, जात विरादरी यहां तक की पूरे मोहल्ले की संवेदनशीलता है।  हम उत्तराखंडियों में इतनी भावुकता और संवेदनशीलता हमें हमारा समाज, हमारी संस्कृति और हमारे रीति-रिवाज सिखा देते हैं कि जब कभी एक-दूसरे से, चाहे वह जानवर हो या इंसान, किसी कारणवश हमें बिछुणना पड़ जाए तो काफी मुश्किल होता है संभलना। लेकिन यह भी सत्य है कि विकास और विनाश एक साथ आगे पीछे चलते हैं। विडंबना है कि आज उत्तराखंड के अधिकतर शहरों का हाल जोशीमठ जैसा होने को है।  मैं जब कभी अपने गांव की ओर निकलता हूं तो नैनीताल का एक तरफ से हो रहा भू-स्खलन बरबस मेरा ध्यान इस ओर खींच लेता है। और सोचता है कि क्या आने वाले कुछ सालों बाद हम नैनीताल को देख पायेंगे। बेत...

होली ...और स्मृतियां ही बाकि रह गयीं

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  उत्तराखंड में होली के त्योहार का अपना ही ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व है। उत्तराखंडी लोगों के लिए सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है होली। क्योंकि यह त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत को दर्शाता तो है ही साथ ही जाती हुई सर्दियों और नयी बुवाई के मौसम की शुरुआत का भी अहसास कराता है। कुमाउंनी होली का संबंध अपनी संगीतमय विविधता से है। कुमाऊं में बंसत पंचमी से शुरू होने वाली होली के कई रंग-रूप हैं। जहां बैठकी होली, खड़ी होली और महिला होली अद्वितीय हैं वहीं शास्त्रीय रागों के द्वारा गाये जाने वाली लोक धुनें व संगीत आध्यात्मिक अहसास दिलाता है।  करीब तीन साल हो गये हमारे पूज्य पिताजी को गये। उनके साथ कई बार शाम की चाय के समय या रात को खाना खाने के बाद गांव के बारे में बातचीत होती थी। गांव की पुरानी बातों को लेकर पिताजी हमेशा ही काफी रोमांचित होते हुए अपनी पुरानी विस्मृतियों को जीवंत करते थे। मैं भी उनकी उन यादगार यादों को बड़ी उत्सुकता के साथ सुनता था। यह कहानी है कुमाऊं के जिला अल्मोड़ा स्थित ब्लॉक द्वाराहाट के अंतर्गत ग्रामसभा डोटलगांव की। कई बरस बीत गये। हमारे गांव में भी कभी हो...

उत्तराखंड में मकर संक्राति और घुघुतिया त्योहार पर रोचक जानकारी

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  उत्तराखंड में मकर संक्राति और घुघुतिया त्योहार पर रोचक जानकारी जनवरी माह में उत्तर भारत में मकर संक्रान्ति, दक्षिण में पोंगल और पंजाब में लोहड़ी बड़े धूमधाम से मनायी जाती है। इस अवसर में उत्तराखंड के कुमाऊं और गढवाल मंडल में एक अलग ही नजारा देखने को मिलता है, पर कुमाँऊ मंडल की तो बात है ही निराली। इस दिन आपको यहां सुबह सुबह कुछ ऐसा सुनायी पड़ेगा - काले कौव्वा काले, घुघुति मावा खाले, ले कौव्वा पूड़ी, मैं कें दे ठुल-ठुलि  ले कौव्वा ढाल, दे मैं कें सुणो थाल, ले कौव्वा तलवार, बणो दे मैं कें होश्यार। याद आता है अपना बचपन। गले में तलवार, ढाल, दाड़िम का फूल, डमरु, खजूर, घुघुति और नारंगी की माला पहने हुए हम सभी बच्चे खुशियां मना रहे होते होते थे। लेकिन इससे पहले जरा मकर संक्रान्ति के महत्व के बारे में जानते हैं फिर बताते हैं कि इस अवसर पर उत्तराखंड में क्या रौनक रहती है। मकर संक्रान्ति का महत्व शास्त्रों के अनुसार ऐसी मान्यता है कि इस दिन सूर्य (भगवान) अपने पुत्र शनि से मिलने उनके घर जाते हैं। अब ज्योतिष के हिसाब से शनिदेव हैं मकर राशि के स्वामी, इसलिये इस दिन को जाना जाता है मकर सं...

उत्तराखंड की ऐतिहासिक सांस्कृतिक परंपराओं की विरासत हैं यहां के वाद्य यंत्र

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भारत ही नहीं अपितु लगभग पूरे विश्व  में उत्तराखण्ड अपनी समृद्ध और गौरवशाली सांस्कृतिक परम्परा के लिए विख्यात है। अपनी परम्परा, विरासत और संस्कृति को बचाये रखने के लिये जरु री है अपनी लोक गीतों से सजी सांस्कृतिक गतिविधियों को बचाये रखना। लोक संस्कृति और परम्पराओं के लिए महत्वपूर्ण हैं उत्तराखंड के वाद्य यंत्र। खास बात यह है कि यहां के लगभग सभी वाद्य यंत्रों का प्रयोग देव कार्यो में जरूर होता है। दशकों पूर्व हमारे पूर्वजों ने स्थानीय लोक गायन के आधार पर ही वाद्य यंत्र भी विकसित किये थे। इन्हीं लोक वाद्य यंत्रों पर विशेष- रणसिंग- अमूमन आज इस वाद्य यंत्र को आप सभी विभिन्न उत्सवों, देव कार्यो और शादी विवाहों में देखते होंगे। यह वीर रस उत्पन्न करने वाला वाद्य है, यह तांबे का बना होता है और सर्पिले आकार का होता है। इसको मुंह से फूंक देकर ही बचाते हैं। इसमें से जो आवाज निकलती है वह विजय की भावना को मानस पटल पर रखता है। कालांतर में असुरों - देवताओं और राजा महाराजों के युद्ध और विजय के समय इसे बजाया जाता था। हुड़का- लोक वाद्यों में हुड़का उत्तराखंड में विशेषकर कुमाऊं में सर्वाधिक लोकप्रिय वा...

कृपया जरूर देखें उत्तराखंड के मशहूर कलाकारों द्वारा मंचित एक कहानी

https://youtu.be/vaymatTFhbg

समृद्ध है भारतीय मूर्तिशिल्प की परंपरा : रमेश बिष्ट

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  यह जानना बहुत दिलचस्प होता है कि कैसे कोई कलाकार कला परंपरा से समृद्ध होता हुआ स्वयं में ज्ञान मीमांसा का स्रोत बन जाता है और एक बौद्धिक कलाकार की भूमिका अदा करने लगता है । कलाकार बनने की और एक श्रेष्ठ मूर्तिकार के रूप में निर्माण की प्रारंभिक ज्ञान मीमांसक प्रक्रिया का स्वरूप कैसा रहा उसकी एक बानगी इस कलाकार की बचपन में हुई एक घटना से समझी जा सकती है इसके पूर्व जब मैं इस घटना का जिक्र कर रहा हूं तो कलाकार का परिचय कराना भी आवश्यक जान पड़ता है यह और कोई नहीं एक शांति पसंद आधुनिक कला जगत के वरिष्ठ समकालीन मूर्तिकार रमेश बिष्ट हैं। अब मैं उस घटना विशेष पर आता हूं जब यह कलाकार छोटा सा ही था यानी बचपन के दिन और यह प्राय: अपने घर के आसपास की दीवारों और पेड़ों पर आकृतियां उकेर देता था। यह उस जगह की बात है जहां प्राय: दूर-दूर तक इक्का दुक्का ही इंसान नजर आते थे शेष पशु-पक्षी ही विचरते थे यह जगह थी पौढ़ी गढ़वाल के लैंसडाउन के घने जंगलों के बीच बसा वह गांव जहां सीमित आबादी थी पर भरे पूरे परिवार में जन्म लेने वाला वह व्यक्ति हर दिन की भांति दीवारों पर अपने आस-पास की गतिवधियों को अंकित कर...