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कुमाऊँ की समृद्ध लोक संस्कृति का प्रतीक है लोकपर्व-खतड़वा

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  खतड़वा : कुमाऊँ की समृद्ध लोकसंस्कृति, परंपरा और पशुधन संरक्षण का लोकपर्व देवभूमि उत्तराखंड केवल अपनी हिमालयी सुंदरता के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी हजारों वर्षों पुरानी लोकपरंपराओं, आस्था, रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक विरासत के लिए भी विशेष पहचान रखता है। यहां का प्रत्येक पर्व और उत्सव प्रकृति, देवत्व, सामाजिक जीवन और लोकविश्वासों से गहराई से जुड़ा हुआ है। इन्हीं समृद्ध परंपराओं में कुमाऊँ का एक विशिष्ट लोकपर्व है- खतड़वा । कुमाऊँ : इतिहास, संस्कृति और लोकजीवन की धरती कुमाऊँ का इतिहास प्राचीन कूर्मांचल से जुड़ा माना जाता है। सदियों से यह क्षेत्र विभिन्न राजवंशों, स्थानीय राजाओं और सामंतों के शासन तथा सांस्कृतिक आदान-प्रदान का केंद्र रहा है। विशेष रूप से चंद राजवंश ने कुमाऊँ के इतिहास, प्रशासन, मंदिर स्थापत्य, कला और संस्कृति को गहरी पहचान दी। चंद शासकों की राजधानी चंपावत से आगे चलकर अल्मोड़ा बनी, जो लंबे समय तक कुमाऊँ की राजनीतिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र रही। कुमाऊँ की पहचान उसके मंदिरों, लोकदेवताओं, लोकगीतों, झोड़ा-चांचरी , छोलिया नृत्य, पारंपरिक वेशभूषा, ख...

घी संक्रांति : उत्तराखंड की समृद्ध संस्कृति

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चलिए आज घी संक्रांति या ‘घ्यूँ त्यार' पर एक और याद को ताजा करते हैं। जो इसे पढ़ेगा नहीं अगले जन्म में गनेल बनेगा ध्यान रखना, पैली बै तस्से कुन्येर हाई 'जो आजक दिन आपण ख्वार में घ्यूँ नि लगालो या नि खालो तो आघिल जन्म मा गनेल बनौल' इसलिए पढ़ना भी जरूरी है - 'घी संक्रांति' का लोकपर्व हमारे पहाड़ की मिट्टी, समृद्ध संस्कृति और रिश्तों की वह खूबसूरत स्मृति है, जो पहाड़ से दूर रहने वाले हम और आप जैसों को भी अपने गांव की याद दिला देती है। भादों माह के पहले पैठ के दिन मनाए जाने वाली घी संक्रांति पर आज भी हमें वह दिन याद आते हैं जब सुबह सुबह घर में घी की खुशबू फैल जाती थी, बेडू की रोटी, गाब (अरबी के पत्ते) का साग, पूरी, खीर और पहाड़ी ककड़ी के रायते की थाली सजती थी। आज यह स ब सोच कर लगता है जैसे बरसों पुराना बचपन फिर लौट आया हो। आमा-बूबू, ईजा-बोज्यू का हमारे सिर पर घी लगाकर आशीर्वाद देना, अपने आस पड़ोस में संक्रांति बाँटना, गाँव के सभी मंदिरों में पखोव भेंट चढ़ाना और प्रेम से एक-दूसरे का हाल पूछना, इन छोटी-छोटी परंपराओं में पहाड़ का बड़ा-सा अपनापन बसता है। यह पर्व अच्छे...

हमारे कुमाऊँ क्षेत्र के भूले-विसरे रिति रिवाज

  हमारे कुमाऊँ क्षेत्र के भूले-विसरे रिति रिवाज, पढ़िएगा जरूर। अच्छा भी लगेगा और कुछ यादें भी ताजा होंगी- एक समय था जब हमारे पहाड़ों में 'धन्यवाद' जैसा कोई शब्द नहीं होता था। किसी ने एहसान या मदद कर दी तो उसके बदले कहा जाता था - ‘तुमर भल है जौ, तुमार नानतिन बची रून, तुमार खुटन कान् ले झन बुडो।’ अगर एहसान ज्यादा ही हुवा तो कहेते थे - ‘तुमरि एकै एक्कीस / पांचै पंच्चीस हैजौ, जै-जै कारी हैजौ।’ बाद में जब धन्यवाद शब्द चलन में आया तो शुरु में लोग मजाक में कहते ... ‘हैगोय यो धणियोंपात रूण दिओ।’ अब बात करते हैं मिठाई की ... उस समय मिठाई का मतलब गुड़ से होता था ... लोग कहा करते थे ... ‘पास हैगो बल तुमर च्योल ... गूड़ खवाओ,’ यहां भी जवाब में धन्यवाद नहीं कहा जाता था ... कहते थे - ‘होय हैगोपै तुमार आशीर्वादल ... घर आया एक आंगू पिठ्या लगै ल्हिजया और गूड़ ले खै जया ...’ हर खुशी के मौके पर गुड़ बाटा जाता था और बधाई देने आये व्यक्ति या महिला को पिठ्या ( टीका ) भी लगाया जाता ... कई बार अगर दोपहर या शाम को लोग बधाई देने किसी के घर जाते तो वहां पिठ्या लगता ... तो वापस जाने पर रास्ते में ...

क्यों है कुमाऊं में वसंत पंचमी का खास महत्व !

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  अपनी समृद्ध संस्कृति, वैभवशाली परम्पराओं, अभूतपूर्व प्राकृतिक सौंदर्य के लिए उत्तराखंड देश में ही नहीं अपितु समस्त वि में प्रसिद्ध है। यहां के तीज त्योहारों में भी प्रकृति प्रेम और सद्भाव की भावना झलकती है। बसंत पंचमी का त्यौहार उत्तराखंड में प्रकृति प्रेम और आपसी सद्भाव के रूप में मनाया जाता है। बसंत पंचमी फूलों के खिलने और नई फसल के आने का भी त्योहार है। इस दिन दान और स्नान का विशेष महत्त्व है। स्थानीय नागरिक अपनी पवित्र नदियों में स्नान या अपने आसपास के प्राकृतिक जल श्रोतों में स्नान करने जाते हैं। फिर गाय के गोबर से घर की लिपाई पोताई कर, घर के मुख्य दरवाजे में सरसों के पीले फूल डालें जाते हैं। कुमाऊं में बसंत पंचमी के त्यौहार को ‘जौ त्यार’ के नाम से भी जाना जाता है। जौ इस समय नई फसल होती है इसलिए घर के दरवाजों के किनारों पर भी जौ की पत्तियां लगाई जाती हैं। जौ को सुख और समृद्धि का प्रतीक भी माना जाता है। इसलिए इसे देवताओं से लेकर घर में सभी सदस्यों के सिरों में भी इन्हें शुभाशीष  के तौर पर रखा जाता है। इस दिन घर में खास पकवान भी बनाये जाते हैं।  इस वर्ष बसंत पंचमी ...

कहीं नैनीताल भी स्मृतियों में ही शेष ना रह जाए?

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याद आता है 2002 या 2003 का वह समय जब टिहरी बांध बन रहा था और पुरानी टिहरी से लोग अपने डूबते घरों को छोड़ने को विवश हो रहे थे। वही हालात आज फिर जोशीमठ के रोते बिलखते परिजनों को देखकर महसूस किया जा सकता है। बड़ा कठिन होता है उस जगह को छोड़ना जहां हम पैदा हुए, बचपन गुजरा, जवानी बीती और अब बुढ़ापा गुजार रहे हों। यह सिर्फ एक व्यक्ति की संवेदना नहीं! यह परिवार, कुटुंब, रिश्ते नाते, जात विरादरी यहां तक की पूरे मोहल्ले की संवेदनशीलता है।  हम उत्तराखंडियों में इतनी भावुकता और संवेदनशीलता हमें हमारा समाज, हमारी संस्कृति और हमारे रीति-रिवाज सिखा देते हैं कि जब कभी एक-दूसरे से, चाहे वह जानवर हो या इंसान, किसी कारणवश हमें बिछुणना पड़ जाए तो काफी मुश्किल होता है संभलना। लेकिन यह भी सत्य है कि विकास और विनाश एक साथ आगे पीछे चलते हैं। विडंबना है कि आज उत्तराखंड के अधिकतर शहरों का हाल जोशीमठ जैसा होने को है।  मैं जब कभी अपने गांव की ओर निकलता हूं तो नैनीताल का एक तरफ से हो रहा भू-स्खलन बरबस मेरा ध्यान इस ओर खींच लेता है। और सोचता है कि क्या आने वाले कुछ सालों बाद हम नैनीताल को देख पायेंगे। बेत...

होली ...और स्मृतियां ही बाकि रह गयीं

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  उत्तराखंड में होली के त्योहार का अपना ही ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व है। उत्तराखंडी लोगों के लिए सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है होली। क्योंकि यह त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत को दर्शाता तो है ही साथ ही जाती हुई सर्दियों और नयी बुवाई के मौसम की शुरुआत का भी अहसास कराता है। कुमाउंनी होली का संबंध अपनी संगीतमय विविधता से है। कुमाऊं में बंसत पंचमी से शुरू होने वाली होली के कई रंग-रूप हैं। जहां बैठकी होली, खड़ी होली और महिला होली अद्वितीय हैं वहीं शास्त्रीय रागों के द्वारा गाये जाने वाली लोक धुनें व संगीत आध्यात्मिक अहसास दिलाता है।  करीब तीन साल हो गये हमारे पूज्य पिताजी को गये। उनके साथ कई बार शाम की चाय के समय या रात को खाना खाने के बाद गांव के बारे में बातचीत होती थी। गांव की पुरानी बातों को लेकर पिताजी हमेशा ही काफी रोमांचित होते हुए अपनी पुरानी विस्मृतियों को जीवंत करते थे। मैं भी उनकी उन यादगार यादों को बड़ी उत्सुकता के साथ सुनता था। यह कहानी है कुमाऊं के जिला अल्मोड़ा स्थित ब्लॉक द्वाराहाट के अंतर्गत ग्रामसभा डोटलगांव की। कई बरस बीत गये। हमारे गांव में भी कभी हो...

उत्तराखंड में मकर संक्राति और घुघुतिया त्योहार पर रोचक जानकारी

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  उत्तराखंड में मकर संक्राति और घुघुतिया त्योहार पर रोचक जानकारी जनवरी माह में उत्तर भारत में मकर संक्रान्ति, दक्षिण में पोंगल और पंजाब में लोहड़ी बड़े धूमधाम से मनायी जाती है। इस अवसर में उत्तराखंड के कुमाऊं और गढवाल मंडल में एक अलग ही नजारा देखने को मिलता है, पर कुमाँऊ मंडल की तो बात है ही निराली। इस दिन आपको यहां सुबह सुबह कुछ ऐसा सुनायी पड़ेगा - काले कौव्वा काले, घुघुति मावा खाले, ले कौव्वा पूड़ी, मैं कें दे ठुल-ठुलि  ले कौव्वा ढाल, दे मैं कें सुणो थाल, ले कौव्वा तलवार, बणो दे मैं कें होश्यार। याद आता है अपना बचपन। गले में तलवार, ढाल, दाड़िम का फूल, डमरु, खजूर, घुघुति और नारंगी की माला पहने हुए हम सभी बच्चे खुशियां मना रहे होते होते थे। लेकिन इससे पहले जरा मकर संक्रान्ति के महत्व के बारे में जानते हैं फिर बताते हैं कि इस अवसर पर उत्तराखंड में क्या रौनक रहती है। मकर संक्रान्ति का महत्व शास्त्रों के अनुसार ऐसी मान्यता है कि इस दिन सूर्य (भगवान) अपने पुत्र शनि से मिलने उनके घर जाते हैं। अब ज्योतिष के हिसाब से शनिदेव हैं मकर राशि के स्वामी, इसलिये इस दिन को जाना जाता है मकर सं...