घी संक्रांति : उत्तराखंड की समृद्ध संस्कृति
चलिए आज घी संक्रांति या ‘घ्यूँ त्यार' पर एक और याद को ताजा करते हैं। जो इसे पढ़ेगा नहीं अगले जन्म में गनेल बनेगा ध्यान रखना, पैली बै तस्से कुन्येर हाई 'जो आजक दिन आपण ख्वार में घ्यूँ नि लगालो या नि खालो तो आघिल जन्म मा गनेल बनौल' इसलिए पढ़ना भी जरूरी है -
'घी संक्रांति' का लोकपर्व हमारे पहाड़ की मिट्टी, समृद्ध संस्कृति और रिश्तों की वह खूबसूरत स्मृति है, जो पहाड़ से दूर रहने वाले हम और आप जैसों को भी अपने गांव की याद दिला देती है। भादों माह के पहले पैठ के दिन मनाए जाने वाली घी संक्रांति पर आज भी हमें वह दिन याद आते हैं जब सुबह सुबह घर में घी की खुशबू फैल जाती थी, बेडू की रोटी, गाब (अरबी के पत्ते) का साग, पूरी, खीर और पहाड़ी ककड़ी के रायते की थाली सजती थी। आज यह सब सोच कर लगता है जैसे बरसों पुराना बचपन फिर लौट आया हो। आमा-बूबू, ईजा-बोज्यू का हमारे सिर पर घी लगाकर आशीर्वाद देना, अपने आस पड़ोस में संक्रांति बाँटना, गाँव के सभी मंदिरों में पखोव भेंट चढ़ाना और प्रेम से एक-दूसरे का हाल पूछना, इन छोटी-छोटी परंपराओं में पहाड़ का बड़ा-सा अपनापन बसता है। यह पर्व अच्छे स्वास्थ्य, समृद्धि और लंबी उम्र की कामना के साथ प्रकृति, पशुधन और अपनी जड़ों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर भी है।
आज जब हम और आप जैसे पहाड़ के अनेक परिवार रोज़गार और बेहतर अवसरों की तलाश में दूर शहरों व देश विदेशों में बस गए हैं। मगर घी संक्रांति या अन्य त्योहारों के आते ही दूरी जैसे मिट जाती है, मन फिर उसी आंगन में पहुंच जाता है, जहां ईजा के हाथों की खुशबू थी, आमा का आशीर्वाद था, घर की गाय-भेंस का दूध था और पहाड़ की हवा में अपनेपन की मिठास थी। शायद यही हमारे लोकपर्वों की सबसे बड़ी ताकत है, वे हमें हमारी जड़ों से जोड़े रखते हैं, चाहे हम उनसे कितनी भी दूर क्यों न चले जाएं। आज 'घ्यूँ त्यार' पर आइए, अपनी मिट्टी, अपने गांव और उन रिश्तों को याद करें, जो पहाड़ छोड़ आने के बाद भी हमारे भीतर कभी नहीं छूटे। घी की यह छोटी-सी परंपरा हमें याद दिलाती है कि पहाड़ से दूरी हो सकती है, लेकिन पहाड़ दिल से कभी दूर नहीं होता।
धन्यवाद

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