क्यों है कुमाऊं में वसंत पंचमी का खास महत्व !
अपनी समृद्ध संस्कृति, वैभवशाली परम्पराओं, अभूतपूर्व प्राकृतिक सौंदर्य के लिए उत्तराखंड देश में ही नहीं अपितु समस्त वि में प्रसिद्ध है। यहां के तीज त्योहारों में भी प्रकृति प्रेम और सद्भाव की भावना झलकती है। बसंत पंचमी का त्यौहार उत्तराखंड में प्रकृति प्रेम और आपसी सद्भाव के रूप में मनाया जाता है। बसंत पंचमी फूलों के खिलने और नई फसल के आने का भी त्योहार है। इस दिन दान और स्नान का विशेष महत्त्व है। स्थानीय नागरिक अपनी पवित्र नदियों में स्नान या अपने आसपास के प्राकृतिक जल श्रोतों में स्नान करने जाते हैं। फिर गाय के गोबर से घर की लिपाई पोताई कर, घर के मुख्य दरवाजे में सरसों के पीले फूल डालें जाते हैं। कुमाऊं में बसंत पंचमी के त्यौहार को ‘जौ त्यार’ के नाम से भी जाना जाता है। जौ इस समय नई फसल होती है इसलिए घर के दरवाजों के किनारों पर भी जौ की पत्तियां लगाई जाती हैं। जौ को सुख और समृद्धि का प्रतीक भी माना जाता है। इसलिए इसे देवताओं से लेकर घर में सभी सदस्यों के सिरों में भी इन्हें शुभाशीष के तौर पर रखा जाता है। इस दिन घर में खास पकवान भी बनाये जाते हैं।
इस वर्ष बसंत पंचमी का त्यौहार 26 जनवरी को मनाया जा रहा है। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार इस दिन देवी सरस्वती का जन्म हुआ था, यही कारण है कि यह त्यौहार हिंदुओं के लिए बहुत खास है। सरस्वती पूजन के साथ साथ बसंत पंचमी को अत्यंत शुभ दिन माना जाता है। बसंत पंचमी के त्यौहार को श्रीपंचमी और माघ पंचमी के नाम से भी मनाया जाता है। इस दिन घर में पूजा पाठ करने के अलावा पूरे गांव के मंदिरों में भी पूजा करके देवी-देवताओं को भोग लगाते हैं। बच्चो को पीले कपडे पहनाते हैं। इस दिन बिना मुहूर्त निकाले सारे शुभ कार्य जैसे बच्चों के कान नाक छेदन, यज्ञोपवीत संस्कार, शादी का रिश्ता करना, सगाई करना, मुहुर्त तिथि निश्चित करना आदि हो जाते हैं।
शुरू हो जाती है कुमाऊं में बैठकी होली
बसंत पंचमी से कुमाऊं में होली की शुरुआत हो जाती है। प्रसिद्ध कुमाउनी बैठक होली बसंत पंचमी की शाम से शुरू होकर शिवरात्रि के दिन शाम तक गाई जाती है। बैठकी होली में श्रृंगार रस का भरपूर समावेश होता है। फिर एकादशी से खड़ी होली शुरू हो जाती है।
भारतीय पंचांग में छह ऋतूऐ होती है। बसंत ऋतू को ऋतुओ का राजा कहा जाता है। इस मौसम में खेतों में पीले फूलों के साथ सरसों की फसल, बुरांश के फूल, फलदार वृक्षों के फूल, चारों तरफ हरियाली और गुलाबी ठण्ड मौसम को और भी खुशनुमा बना देती है ।
कुमाऊं में बसंत पंचमी के शुभ अवसर पर सिर में जौ रखते हुए एक-दूसरे को ‘जी राया, जागी राया, यौ दिन यौ बार भेटनै रया, के आशीष वचनो के साथ शुभकामनायें दी जाती हैं।
बसंत ऋतु पर आधारित कुमाऊंनी कविता
उत्तराखंड के साहित्यकार व कुमाऊंनी कवि स्व. हंसा दत्त पांडेय जी ने बसंत पर कुमाऊंनी भाषा में कुछ यूं लिखा-
आहा रे बसंता उनै रै जये , रंग-बहार ल्युनै रै जये,
हाँग-फ़ांग, पुंग-पांगी फूटा, किल्मोड़ी भूझा, लाल-लाल गुदा,
खिलंड़ लगा फूल अनेका, लाल, पीला और सफेदा,
दैण, पिहलों, स्यार हरिया,रंग-बिरंगा साड़ी पैरिया
डान-कान छाजणों बुरुंशी क फूला, जाण कौला जग रों लाल बलबा,
बहार ऐगे चारों तरफा, हवा बहनै चारों तरफा,
भागी गो जाड़ा , हसनौ बसंता , फूल गई फूल रंग-बिरंगा
य बसन्त लगौनौ कदुक प्यारा, चाड पिटंगा गानैई गीता,
रंगीलो बसंता उनै र जये, घर-घर द्वार-द्वार रंग बरसेये।
आहा रे बसंता उनै रै जये, रंग-बहार ल्युनै रै जये,
‘‘हंसा’’ करणों अरज आजा, बसन्त-बसंती सतरंग फोकिये ,
उदेख मनखी, बोट-डाव-पक्षी, हरिया-भारिया खूब खिलैये
आहा रे बसंता उनै रै जये, रंग बहार ल्युनै रै जये।।




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