होली ...और स्मृतियां ही बाकि रह गयीं
उत्तराखंड में होली के त्योहार का अपना ही ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व है। उत्तराखंडी लोगों के लिए सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है होली। क्योंकि यह त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत को दर्शाता तो है ही साथ ही जाती हुई सर्दियों और नयी बुवाई के मौसम की शुरुआत का भी अहसास कराता है। कुमाउंनी होली का संबंध अपनी संगीतमय विविधता से है। कुमाऊं में बंसत पंचमी से शुरू होने वाली होली के कई रंग-रूप हैं। जहां बैठकी होली, खड़ी होली और महिला होली अद्वितीय हैं वहीं शास्त्रीय रागों के द्वारा गाये जाने वाली लोक धुनें व संगीत आध्यात्मिक अहसास दिलाता है।
करीब तीन साल हो गये हमारे पूज्य पिताजी को गये। उनके साथ कई बार शाम की चाय के समय या रात को खाना खाने के बाद गांव के बारे में बातचीत होती थी। गांव की पुरानी बातों को लेकर पिताजी हमेशा ही काफी रोमांचित होते हुए अपनी पुरानी विस्मृतियों को जीवंत करते थे। मैं भी उनकी उन यादगार यादों को बड़ी उत्सुकता के साथ सुनता था। यह कहानी है कुमाऊं के जिला अल्मोड़ा स्थित ब्लॉक द्वाराहाट के अंतर्गत ग्रामसभा डोटलगांव की। कई बरस बीत गये। हमारे गांव में भी कभी होली का उत्सव बड़े उत्साह व उल्लास के साथ मनाया जाता था। उन्हीं चंद धूमिल होती यादों को अपने इस पेज व ब्लॉग के माध्यम से अपने स्वर्गीय पूज्य पिताजी और गांव के ही कुछ बुजुर्गों से सेतचीत के आधार पर आप सभी उत्तराखंडवासियों के समक्ष रख रहा हूं। हो सकता है कुछ बातें आज के परिवेश के मुताबिक ना हों! क्योंकि बातें 1950 - 60 के आसपास की हैं। कई बुजुर्ग अब हमारे बीच रहे नहीं, जो हैं उनकी भी याददाश्त अब उतनी रही नहीं। यह लेख सिर्फ इसलिए प्रकाशित करने की इच्छा है ताकि हमें अपने पुराने इतिहास - संस्कृति व अपने उन स्वर्गीय बुजुगार्ें -पितरों के बारे में थोड़ा-बहुत ज्ञान मिल सके जो अपने आप में एक कहानी हुआ करते थे। इसलिए अगर किसी व्यक्ति विशेष को इस लेख से कोई आपत्ति हो तो लेखक सार्वजनिक रूप से क्षमाप्रार्थी है।
तो चलते हैं अपने पुराने गांव-समाज की ओर! बात आज से करीब 60 - 70 साल पुरानी है। ग्रामसभा डोटलगांव उस समय दूरस्थ जंगलों में बसा हुआ एक गांव था। सड़क मार्ग उस समय मजखाली (रानीखेत के पास) तक ही सीमित था। यहां से हमारा गांव करीब 20 किलोमीटर है। गगास नदी (हमारे क्षेत्र में बहने वाली एक नदी) वाली सड़क का निर्माण भी नहीं हुआ था। वर्तमान में यह सड़क रानीखेत से द्वाराहाट, बग्वाली पोखर व सोमेर को जोड़ती है। गांव के लोगों के पास खानपान का एक ही जरिया हुआ करता था खेती-बाड़ी। क्योंकि खेती की ज्यादातर जमीन भी हमारी ऊपरी इलाकों में हुआ करती थी जहां पानी की काफी समस्याएं होती थीं। इसलिए धान-गेहूं की उपज कम ही हुआ करती थी, ज्यादातर मडुआ, जौ, बाजरा हुआ करता था। जो परिवार थोड़ा बड़े थे वो लोग अपने परिवार सहित व मवेशियों को लेकर साल के छह-सात महीने भाबर (रामनगर) के जंगलों में चले जाया करते थे और वहीं झोपड़ियां बनाकर व बांस काटकर अपना जीवन यापन करते थे। लेकिन उस समय दूध-दही का अपार भंडार हुआ करता था हमारे गांव में। गांव के पुरुष काफी बलशाली व ताकतवर हुआ करते थे। साथ ही ये पुरुष काफी रंगीले मिजाज - संस्कृति प्रिय व अपने रीति रिवाजों के लिए हमेशा समर्पित होते थे।
हमारे गांव में भी होली का उत्सव बड़े जोशो-खरोश के साथ मनाया जाता था। जिसकी शुरुआत आदरणीय स्वर्गिय श्री प्रेम सिंह शाही (पूरे क्षेत्र में पंडित जी के नाम से प्रसिद्ध थे और उस समय ग्राम प्रधान भी थे) जी के आवास से होती थी। आदरणीय स्व. प्रेमसिंह शाही जी अद्भुत ज्ञान के भंडार के साथ ही काफी दबंग भी थे। पूरा गांव उनकी काफी इज्जत करता था, बिना उनकी इजाजत के गांव के अंदर कोई नहीं आ पाता था। स्व. पंडित जी पहले बग्वाली पोखर अपर स्कूल में अध्यापक थे, बाद में रतगल के पास सिमरख्वाल में पढ़ाया करते थे। क्योंकि उस समय हमारे गांव में कोई स्कूल नहीं था सभी बच्चे सिमरख्वाल पढ़ने जाया करते थे।
बात करते हैं होली की। स्व. प्रेम सिंह पंडित जी के घर में होली के लिए प्राकृतिक रूप से रंग बनाया जाता था। जंगलों से विभिन्न प्रकार के फूल तोड़ कर लाये जाते थे जिनसे बड़े-बड़े बर्तनों में रंग बनाया जाता था। फिर गांव में एक आवाज दी जाती थी कि आकर सभी लोग रंग ले जाओ करके। सभी पुरुष लोग अपने होली के परिधानों में आते थे। जिसमें खास होता था सफेद रंग की पगड़ी और चोला। पंडित जी के आवास पर आकर सभी लोग एक-दूसरे के कपड़ों पर रंग डालते थे और ढोल-नगाड़े-मजीरे व मशकबीन के साथ होता था होली का आगाज।
हमारा गांव काफी बड़ा गांव है। जो करीब 7 से 8 किलोमीटर की परिधि में बसा हुआ है और करीब 7 तोकों में बसा हुआ है। वार-पार- चींड़कोट- ब्राह्मणकोट- रिखाड़ आदि नामों में विभाजित यह गांव काफी विस्तृत है। स्व. पिताजी के अनुसार उस समय होली हगारे गांव में सभी के घर-घर जाया करती थी। पहले दिन ग्राम प्रधान व दूसरे दिन होली कालिका मंदिर (गांव में सबसे ऊपर स्थित) में पहुंचती थी, फिर वहीं से (बाखलियों में बंटे हिस्सों) पारबाखली, ग्वाड़, डुमनोला, कनकेधार और तीसरे दिन होली रिखाड़ पहुंचती थी जहां खूब मस्ती होती थी। हुलियारों में पुरुषों व बच्चों की टोली गीत गाते हुए व हुड़दंग करते हुए चलती थी। क्योंकि उस समय शराब के नशे का उतना चलन नहीं था। कोई करता होगा तो सिर्फ भांग का नशा करता होगा। इसके बाद होली बामणकोट व चींड़कोट होते हुए पार गांव पहुंचती थी। उस समय गांव के स्व. श्री रामसिंह तिमराव , स्व. श्री चंदर सिंह तिमराव , स्व. श्री बचे सिंह रंगवाल और स्व. श्री किशन सिंह शाही आदि ये कुछ बुजुर्ग पार गांव से थे जो काफी रंगीले मिजाज व होली के डांगर हुआ करते थे। वार गांव से स्व. श्री बचे सिंह शाही, स्व. श्री प्रेम सिंह शाही (नकुड़), स्व. श्री पान सिंह कुवार्बी (रेला), स्व. श्री लक्ष्मण सिंह शाही, स्व. श्री धनसिंह शाही, स्व. श्री गुलाब सिंह शाही जी, व स्व. श्री शेर सिंह बिष्ट (रिखाड़) आदि बहुत सारे बुजुर्ग, ये सभी होली व झोड़ों के डांगर हुआ करते थे। कुछ डांगर तो इतने सख्त होते थे कि जो होली गाते समय ठीक से पैर नहीं मिलाते थे उनके पैरों में लकड़ी से मार देते थे।
जल कैसे भरूं जमुना गहरी -2
ठाड़ी भरूं राजा राम जी देखें
बैठी भरूं भीजे चुनरी
जल कैसे..
धीरे चलूं घर सास बुरी है
धमकि चलूं छलके गगरी
जल कैसे...
गोदी में बालक सिर पर गागर
परवत से उतरी गोरी
जल कैसे..
पिताजी बताते थे होली के इन दिनों में रोज गढरी की सब्जी बनायी जाती थी। और सभी बड़े आनंद से इसका लुत्फ उठाते थे। होली का आखिरी पड़ाव कत्यूरांखली (गांव के बीचों बीच स्थित कत्यूर देवताओं का मंदिर) में होता था। जहां सभी पुरुष अलग-अलग तरह के स्ंवाग रचते थे। कोई महिला बनता तो कोई जोकर। पूरा गांव इस दिन का आनंद लेता था। महिलाएं भी इस दिन होली का पूरा आनंद लेती थीं। फिर सभी गांववासियों को गीत के माध्यम से शुभकामनाएं दी जाती थीं
हो हो हो लख रे
हमार आमा बुबू जी रौला सौ लाख बरिस
हमार इजा बौजू जी रौला सौ लाख बरिस
हमार दाज्यू भौजी जी रौला सौ लाख बरिस
हो हो हो लख रे
यह होली हमारे गांव में 1975 के आस-पास तक होती थी। समय बदला हमारी संस्कृति हमारी विरासत लुप्त होती गयीं। कभी झोड़े-चांचरी के रंग में तो कभी रामलीला के रंगमंच को अपने में समेटे रखने वाले गांव को पलायन ने तो झकझोर के रखा ही साथ ही वर्तमान पीढ़ी को भी अब इनमें कोई दिलचस्पी नहीं रही। इसी कारण लुप्त होती गयी अपने समाज के लिए हमारी कुछ कर गुजरने की इच्छाएं। अपना व अपने परिवार तक हम लोग सीमित रह गये। जीवन की इस भागम-भाग में हम भूल गये कि हमारी जड़ें कहां थी? लेकिन धीरे - धीरे समय फिर करवट ले रहा है। हो सकता है आने वाले समय में हमारे गांव फिर से बसेंगे। हो सकता है फिर से हमारे गांव में समय-समय पर सांस्कृति कार्यक्रमों का संचालन होगा। जिससे हमारा कटा हुआ समाज अपनी जड़ों से जुड़ेगा।
आभार
प्रभाकर शाही


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