कहीं नैनीताल भी स्मृतियों में ही शेष ना रह जाए?
याद आता है 2002 या 2003 का वह समय जब टिहरी बांध बन रहा था और पुरानी टिहरी से लोग अपने डूबते घरों को छोड़ने को विवश हो रहे थे। वही हालात आज फिर जोशीमठ के रोते बिलखते परिजनों को देखकर महसूस किया जा सकता है। बड़ा कठिन होता है उस जगह को छोड़ना जहां हम पैदा हुए, बचपन गुजरा, जवानी बीती और अब बुढ़ापा गुजार रहे हों। यह सिर्फ एक व्यक्ति की संवेदना नहीं! यह परिवार, कुटुंब, रिश्ते नाते, जात विरादरी यहां तक की पूरे मोहल्ले की संवेदनशीलता है।
हम उत्तराखंडियों में इतनी भावुकता और संवेदनशीलता हमें हमारा समाज, हमारी संस्कृति और हमारे रीति-रिवाज सिखा देते हैं कि जब कभी एक-दूसरे से, चाहे वह जानवर हो या इंसान, किसी कारणवश हमें बिछुणना पड़ जाए तो काफी मुश्किल होता है संभलना। लेकिन यह भी सत्य है कि विकास और विनाश एक साथ आगे पीछे चलते हैं। विडंबना है कि आज उत्तराखंड के अधिकतर शहरों का हाल जोशीमठ जैसा होने को है।
मैं जब कभी अपने गांव की ओर निकलता हूं तो नैनीताल का एक तरफ से हो रहा भू-स्खलन बरबस मेरा ध्यान इस ओर खींच लेता है। और सोचता है कि क्या आने वाले कुछ सालों बाद हम नैनीताल को देख पायेंगे। बेतहाशा और अनियंत्रित होते निर्माण कार्यों और दिन प्रतिदिन खिसक रहे पहाड़ शायद यही कह रहे हैं कि एक दिन यहां भी सिर्फ स्मृतियां शेष रह जायेंगी! अंग्रेजी शासन काल में शायद उनके भू- वैज्ञानिक और इंजीनियर उत्तराखंड के पहाड़ों के हालातों से अच्छी तरह वाकिफ हो गये थे। और शायद यही कारण था कि उन्होंने उत्तराखंड के कमजोर पहाड़ों में भारी निर्माण कार्य नहीं किए और ना ही किसी को इजाजत दी।
अल्मोड़ा के हवलबाग में जन्मे उत्तराखंड के महान कवि स्व गिरिश चंद्र तिवारी जी (गिर्दा) ने कभी लिखा था-
एक तरफ बर्बाद बस्तियाँ-एक तरफ हो तुम।
एक तरफ डूबती कश्तियाँ-एक तरफ हो तुम।
एक तरफ है सूखी नदियाँ-एक तरफ हो तुम।
एक तरफ है प्यासी दुनिया- एक तरफ हो तुम।
अजी वाह! क्या बात तुम्हारी, तुम तो पानी के व्यापारी
खेल तुम्हारा, तुम्हीं खिलाड़ी,, बिछी हुई ये बिसात तुम्हारी
सारा पानी चूस रहे हो, नदी-समन्दर लूट रहे हो
गंगा-यमुना की छाती पर, कंकड़-पत्थर कूट रहे हो
उफ!! तुम्हारी ये खुदगर्जी, चलेगी कब तक ये मनमर्जी
जिस दिन डोलेगी ये धरती, सर से निकलेगी सब मस्ती
महल-चौबारे बह जायेंगे, खाली रौखड़ रह जायेंगे
बूंद-बूंद को तरसोगे जब, बोल व्यापारी-तब क्या होगा?
नगद-उधारी-तब क्या होगा??
आज भले ही मौज उड़ा लो, नदियों को प्यासा तड़पा लो
गंगा को कीचड़ कर डालो
लेकिन डोलेगी जब धरती-बोल व्यापारी-तब क्या होगा?
विश्व बैंक के टोकन धारी-तब क्या होगा?
योजनाकारी-तब क्या होगा?नगद-उधारी तब क्या होगा?
एक तरफ हैं सूखी नदियाँ-एक तरफ हो तुम। एक तरफ है प्यासी दुनिया-एक तरफ हो तुम।
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