उत्तराखण्ड राज्य में पेयजल व्यवस्था
जीवन यापन की मूलभूत आवश्यकताओं में एक शुद्ध पेयजल उत्तराखण्ड राज्य की प्रमुख जिम्मेदारियों में प्रथम स्थान पर है। समुद्र तल से 8000-9000 फीट तक पानी पहुँचाना बहुत बड़ी चुनौती है। प्रकृति के साथ छेड़छाड़, अन्धाधुन्ध जंगलों की कटाई तथा अज्ञानता एवं गैर जिम्मेदारीपूर्ण वृक्षारोपण ने प्राकृतिक संरचना को बिगाड़ कर पहाड़ों को जलविहीन कर दिया।
वृक्षों की नमी बादलों को आकषिर्त करती है तथा नुकीले आकार के वृक्ष (देवदार, साल, चीड़, नीम, (डेंकण), लम्बी जड़ों के वृक्ष (बांज, बुरांस, काफल, अखरोट, रूद्राक्ष) उस नमी को अपनी जड़ों से पहाड़ों की ढलुआ भूमि के अन्दर पहुँचाकर विभिन्न श्रोतों से जल पहाड़ों पर जगह-जगह उपलब्ध कराते हैं।
जल प्रकृति के जटिल पारिस्थितिकी तन्त्र का उत्पादक है। किसी भी जलस्रेत में जल का प्रवाह मुख्यत: उस क्षेत्र की भूगर्भीय संरचना भू-उपयोग व वनस्पतिक आवरण पर निर्भर करता है। इसलिए जलस्रेत से जलप्रवाह को बढ़ाने के लिए स्रेत के जल समेट क्षेत्र का संरक्षण करना आवश्यक है। किन्तु इस क्षेत्र में प्रयास बहुत कम हुए हैं। जबकि सारा ध्यान जलस्रेतों के जल वितरण तक ही सीमित रहा है।
एशिया का ’वाटर पावर’ कहे जाने वाले हिमालय क्षेत्र में पिछले कुछ दशकों से जल सम्बन्धित समस्याऐं लगातार बढ़ी हैं। पर्यावरणीय असन्तुलन के कारण यहाँ के जल चक्र में काफी परिवर्तन आया है। जिससे ग्लेशियरों के सिकुड़ने, जलस्रेतों के सूखने व प्रदूषित होने की समस्याऐं गम्भीर चिन्ता का विषय बन गई हैं। जलस्रेतों के सूखने एवं जलप्रवाह में निरंतर कमी आने से पेयजल घरेलू उपयोग एवं सिंचाई के लिए जल का संकट निरंतर बढ़ता जा रहा है।
उत्तराखण्ड के मध्य हिमालय के बहुत क्षेत्रों में तो ग्रीष्मऋतु में पेयजल का संकट विकराल रूप धारण करने लगा है। इससे लोगों को कम मात्रा में निम्न गुणवत्ता का जल उपयोग करने को बाध्य होना पड़ रहा है। जल बंटबारे को लेकर एक ओर जहाँ आपसी विवाद बढ़ रहे हैं वहीं दूसरी ओर सामाजिक तनाव भी उभर रहे हैं। संकट ग्रस्त गाँवों में पेयजल की आवश्यकता के अनुरूप आपूर्ति न होने के कारण गाँवों से पलायन दर में वृद्धि हो रही है। कहावत है कि ‘‘पहाड़ का पानी और जवानी पहाड़ के काम नहीं आती’’ आवश्यकता है इस कथन को रोका जाए ताकि जनता की प्यास और प्रदेश की आस बनी रहे।
जल जीवन है-जीवन जल है।
इस भगीरथ प्रयास हेतु स्थानीय जनता एवं प्रदेश की सरकारों को अपना प्रयास करना होगा।
1.सर्वप्रथम वनीकरण पर पूरा ध्यान केन्द्रित करना होगा। पहाड़ों पर वष्रा में सहायक वृक्षों का वष्रा ऋतु में वृक्षारोपण करना जैसे देवदार, बाँज, बुरांश के वृक्ष।
2.’मनरेगा’ के अन्तर्गत पहाड़ों पर 4-5 फीट के अन्तराल पर एक फीट चौड़ी एक फीट गहरी कंटूर नालियों का निर्माण करें ताकि वष्रा ऋतु में वष्रा जल नालियों में जमा होकर समूचे पर्वत क्षेत्र में नमी का संचार कर वनस्पति को उपजाने में जहाँ सहायक हो वहीं वष्रा जल को बहने से बचाये इन नालियों में झाड़ीदार पौध रोप कर पानी बहने से रोका जा सकता है।
3. चाल-खाल परंपरा का पुर्नजीवन-
चाल-खाल मानव निर्मित छोटे तालाबों के द्वारा वष्रा जल को संगृहीत कर जानवरों हेतु पेयजल की व्यवस्था भी ’मनरेगा’ के अन्तर्गत कराई जा सकती है। उत्तराखण्ड जल संस्थान ने अब तक हजारों चाल-खाल का निर्माण तथा जीर्णोद्धार कराया है। चाल-खाल जहाँ जंगली जानवरों की प्यास बुझाएगा वहीं आस-पास की भूमि में नमी बनाकर वनस्पति को उगने में सहायता करेगा।
4. प्राकृतिक जल के श्रोतों का जीर्णोद्धार एवं रख-रखाव-
(क) नौले- प्राय: ऐसे जल श्रोत पर निर्मित होते हैं जहाँ से पानी ऊँचाई से न गिरकर जमीन के भीतर से रिसकर जमा होता है। मूलत: यह बावड़ीनुमा संरचना है जिसे आमतौर पर तीन ओर से पत्थर की दीवार से बन्द कर ऊपर से छत डाल दी जाती है। समय-समय पर इन तीन ओर की दीवारों एवं धरातल में चिकनी मिट्टी डाली जाती है ताकि पानी रिसने से रोका जाए।
(ख) धारे/मंगरे- ऐसे जलश्रोत पर निर्मित होते हैं जहाँ पर धरती से पानी ऊँचाई से निकलता है।
प्रदेश सरकार के सफल प्रयास-
उपरोक्त स्थानीय प्रयास सीमित जनसंख्या को लाभान्वित करते हैं। उत्तरांचल शासन पेयजल अनुभाग की अधिसूचना संख्या-2083/नौ-2-(41 अधि0) 2002 दि0 26 अगस्त 2002 से गढ़वाल परिक्षेत्र जल संस्थान और कुमायू परिक्षेत्र जल संस्थान को सम्मलित कर ‘‘उत्तरांचल जल संस्थान’’ का गठन किया गया।
उत्तरांचल कूप-उपरोक्त संस्थान में उत्तरांचल कूप नामक एक नई तकनीक विकसित की है जिसको आई0आई0टी0 रूड़की ने भी पर्वतीय क्षेत्रों के लिए अत्यधिक उपयोगी बताया है। यह तकनीक गधेरों से कुछ ऊँचाई पर बसे गाँव के लिए उपयोगी है।
हैण्डपंप- हैंडपंप पहाड़ों की चोटियों पर बसे गाँवों, नगरों, कस्बों के लिए अत्यंत उपयोगी है। प्रदेश के विशेषज्ञों तथा भू-वैज्ञानिकों की सहायता से जमीन के भीतर बहती जलधाराओं को सुदूर संवेदन विधि से ढँूढ़कर उन्हें हैंडपंपों के जरिये ऊपर खींच निकाला गया। जल विहीन ऊँचे पर्वतीय शिखरों पर यह प्रयोग एक वरदान तथा चमत्कार साबित हुआ। 1999 में 8 हैंडपंप से शुरू होने वाला यह अभियान आज लगभग 7000 से अधिक हैंडपंपों की स्थापना तक पहुँच गया है।
मिनी नलकूप- मैदानी भागों में 60-100 मीटर की गहराई पर स्थित भूजल प्राप्त करने के लिए मिनी नलकूपों का निर्माण होता है।
उपरोक्त विधियों से उत्तराखण्ड निवासियों की प्यास बुझाने में जनता और प्रशासन के आपसी सहयोग से कुछ सफलता अवश्य प्राप्त हुई है। परन्तु गर्मी के महीनों में स्थिति अभी दयनीय बन जाती है। उत्तराखण्ड वह प्रदेश जिसमें नदियों के उद्गम से संगम तक विद्यमान हैं जहाँ से निकली नदियाँ देश के बड़े भू-भाग की जनता की प्यास तथा खेती, किसानी की आस जगाती है स्वयं उत्तराखण्ड वासियों को आसमान की ओर निहारते हुए कहने पर मजबूर करती है। ‘‘सरगा दीदा पाणी दे’’
साभार - उ.सां.स. ग्रेटर नोएडा



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