उत्तराखंड की ऐतिहासिक सांस्कृतिक परंपराओं की विरासत हैं यहां के वाद्य यंत्र

भारत ही नहीं अपितु लगभग पूरे विश्व में उत्तराखण्ड अपनी समृद्ध और गौरवशाली सांस्कृतिक परम्परा के लिए विख्यात है। अपनी परम्परा, विरासत और संस्कृति को बचाये रखने के लिये जरु री है अपनी लोक गीतों से सजी सांस्कृतिक गतिविधियों को बचाये रखना। लोक संस्कृति और परम्पराओं के लिए महत्वपूर्ण हैं उत्तराखंड के वाद्य यंत्र। खास बात यह है कि यहां के लगभग सभी वाद्य यंत्रों का प्रयोग देव कार्यो में जरूर होता है। दशकों पूर्व हमारे पूर्वजों ने स्थानीय लोक गायन के आधार पर ही वाद्य यंत्र भी विकसित किये थे। इन्हीं लोक वाद्य यंत्रों पर विशेष-


रणसिंग- अमूमन आज इस वाद्य यंत्र को आप सभी विभिन्न उत्सवों, देव कार्यो और शादी विवाहों में देखते होंगे। यह वीर रस उत्पन्न करने वाला वाद्य है, यह तांबे का बना होता है और सर्पिले आकार का होता है। इसको मुंह से फूंक देकर ही बचाते हैं। इसमें से जो आवाज निकलती है वह विजय की भावना को मानस पटल पर रखता है। कालांतर में असुरों - देवताओं और राजा महाराजों के युद्ध और विजय के समय इसे बजाया जाता था।


हुड़का- लोक वाद्यों में हुड़का उत्तराखंड में विशेषकर कुमाऊं में सर्वाधिक लोकप्रिय वाद्य यंत्र है। यह देव कार्यो में स्थानीय देवी-देवताओं की जागर के साथ ही झोड़ा-चांचरी, लोक गीतों और लोक नृत्यों में प्रयोग होता है। यह एक खोखली लकड़ी जिसे स्थानीय भाषा में लोग नाई (नाली) के नाम से जानते हैं, के आकार का बना होता है। जिसके दोनों ओर के सिरे को बकरे के आमाशय की झिल्ली से मढ़कर आपस में एक-दूसरे की डोरी से कस दिया जाता है, इसे बजाते समय कंधे में लटकाने के लिये, इसके बीचों बीच से कपड़े की पट्टी को डोरी से बांध दिया जाता है। बरौं व खिन अथवा खिमर की लकड़ी से बने हुडके की नाली विशेष मानी जाती है। प्राय : लोक जागरों व लोक नृत्यों में हुड़के का प्रयोग काफी किया जाता है। 


विजयसार का ढोल- यह ढोल उत्तराखण्ड का पारम्परिक वाद्य यंत्र है। शादी-विवाह, देवताओं के जागर और समस्त मांगलिक कार्यों में ढोल का इस्तेमाल किया जाता है, छलिया नृत्य का यह प्रमुख वाद्य है और कई बार ढोल वादकों द्वारा ढोल बजाने के साथ ही कई मुद्राओं का प्रदशर्न किया जाता है, जिसे ढोल नृत्य भी कहते हैं।



नगाड़ा (दमुवा)- दमुवा दो प्रकार का होता है। एक , जो पतली व कर्कस आवाज करता है, इसे बौं दमुं भी कहते हैं और दूसरा दैन दमुवा होता है जिसे दाहिनी ओर से बजाया जाता है और जो गर्जना के स्वर को पैदा करता है। उपरोक्त दोनों नगाड़े मूलत: तांबे के खोल से बने होते हैं। और इनमें अधिकांशत: भैंसे के चमड़े का प्रयोग किया जाता है। 

बिणाई- बिणाई मुख्यत: उत्तराखण्ड की ग्रामीण महिलाओं द्वारा बजाया जाने वाला एक लोक वाद्य यंत्र है, जो अब बमुश्किल कुछ ही गांवों में दिखाई देता है। यह लोहे से बना एक छोटा सा वाद्य है, जिसे महिलायें उसके दोनों सिरों को अपने दांतों के बीच में दबाकर बजातीं थीं। इन दोनों सिरों के बीच लोहे की एक पतली व लचीली पत्ती लगी होती है। जिसे अंगुली से हिलाने पर कम्पन पैदा होता है, इस कम्पन से वादक के ांस की वायु टकराने पर एक सुरीले स्वर की उत्पत्ति होती 

मुरु ली- पहाड़ के लोक वाद्य की बात मुरु ली के बिना पूरी नहीं हो सकती है। मुरु ली से निकली न्योली की तान सुनकर आज भी आंखों में आंसू आ जाते हैं, बांसुरी या मुरु ली रिंगाल के पुष्ट तनों से बनाई जाती है यह कुशल कारीगर ही बना पाते हैं।  यह पर्वतीय क्षेत्र का लोकप्रिय वाद्य है, जंगल में गाय और जानवर चराते समय ग्वाला जब तान छेड़ता है तो आदमी ही क्या जानवर भी इसकी धुन पर मंत्र-मु़ग्ध हो जाते हैं। 


डौंर- यह डमरू से मिलता हुआ वाद्य यंत्र जागरों और मांगलिक कार्यों में बजाया जाने वाला एक वाद्य है।  इसे एक ओर लकड़ी से और दूसरी ओर से हाथ से बजाया जाता है। इसका प्रचलन गढ़्वाल में ज्यादा किया जाता है जबकि कुमाऊं में जहां घन्याली लगाई जाती है वहां इसका प्रयोग होता है। उत्तराखंड के लोग मानते हैं कि यह भगवान शिव के डमरू का ही एक रूप है। इसलिए इसका प्रयोग सिर्फ ब्राह्मण पुरोहित द्वारा ही किया जाता है। 

जौंया मुरु ली- जौंया शब्द कुमाऊनी में जुड़वा को कहा जाता है और जौंया मुरु ली का अर्थ भी जुड़वा मुरु ली ही है।  इस मुरु ली को बजाना सामान्य मुरु ली से कहीं ज्यादा कठिन है साथ ही इसे बनाना भी कठिन है। रिंगाल के दो तनों को ऐसे स्वच्छ तालाब में डाला जाता है, जिसमें भंवर हो, यह दोनों तने इस भंवर में घूमते रहते हैं और कुछ दिनों बाद आपस में चिपक जाते हैं, फिर जौंया मुरु ली का निर्माण किया जाता है।


भोंकर- प्राय: यह वाद्य यंत्र मंदिरों में पूजा के समय इस्तेमाल होता है। यह तुरु ही की तरह का एक प्राचीन और पवित्र वाद्य है, यह तांबे का लगभग 4-5 फीट लम्बा एक खोखला यंत्र है, जिसमें फूंककर बजाया जाता है, जिसमें से भों-भों की ध्वनि निकलती है और ऊपर उठाने पर इससे पोंपों की ध्वनि आती है, इसीलिये इसे भोंकर कहा जाता है। 


मशकबीन  - वैसे तो मशकबीन एक विदेशी वाद्य है, लेकिन उत्तराखंड की संस्कृति में यह काफी पहले से है। यह वाद्य यंत्र आज उत्तराखंड का प्रमुख पारंपरिक और सांस्कृतिक वाद्य यंत्र है। प्राय: इसका प्रयोग सांस्कृतिक कार्यक्रमों, शादी विवाहों और देव कार्यो में किया जाता है। एक चमड़े की थैली से बने इस वाद्य यंत्र  में चार छेद किये जाते है और तीन पाइप ऊपर की ओर और एक पाइप नीचे की ओर जोड़ा जाता है। साथ ही इसमें हवा भरने के लिये एक पाइप और डाला जाता है। 


धतिया नगाड़ा- वैसे तो उत्तराखंड में कई तरह के वाद्य यंत्र होते थे। लेकिन आज के समय में काफी वाद्य यंत्र अपनी पहचान खो चुके हैं और लुप्त हो रहे हैं। जिनमें अपनी जबरदस्त आवाज के के लिए मशहूर धतिया नगाड़ा भी प्रमुख है।  पूरे कुमाऊं में जागेर धाम में चंद राजाओं द्वारा चढ़ाया गया धतिया नगाड़ा आज भी मौजूद है। इसका वजन 16 किलो है।  किवदंतियों के अनुसार जब यह नगाड़ा बजता था तो गर्भवती महिलाओं के गर्भ गिर जाते थे।


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

उत्तराखंड में मकर संक्राति और घुघुतिया त्योहार पर रोचक जानकारी

कहीं नैनीताल भी स्मृतियों में ही शेष ना रह जाए?