समृद्ध है भारतीय मूर्तिशिल्प की परंपरा : रमेश बिष्ट
यह जानना बहुत दिलचस्प होता है कि कैसे कोई कलाकार कला परंपरा से समृद्ध होता हुआ स्वयं में ज्ञान मीमांसा का स्रोत बन जाता है और एक बौद्धिक कलाकार की भूमिका अदा करने लगता है ।
कलाकार बनने की और एक श्रेष्ठ मूर्तिकार के रूप में निर्माण की प्रारंभिक ज्ञान मीमांसक प्रक्रिया का स्वरूप कैसा रहा उसकी एक बानगी इस कलाकार की बचपन में हुई एक घटना से समझी जा सकती है इसके पूर्व जब मैं इस घटना का जिक्र कर रहा हूं तो कलाकार का परिचय कराना भी आवश्यक जान पड़ता है यह और कोई नहीं एक शांति पसंद आधुनिक कला जगत के वरिष्ठ समकालीन मूर्तिकार रमेश बिष्ट हैं। अब मैं उस घटना विशेष पर आता हूं जब यह कलाकार छोटा सा ही था यानी बचपन के दिन और यह प्राय: अपने घर के आसपास की दीवारों और पेड़ों पर आकृतियां उकेर देता था। यह उस जगह की बात है जहां प्राय: दूर-दूर तक इक्का दुक्का ही इंसान नजर आते थे शेष पशु-पक्षी ही विचरते थे यह जगह थी पौढ़ी गढ़वाल के लैंसडाउन के घने जंगलों के बीच बसा वह गांव जहां सीमित आबादी थी पर भरे पूरे परिवार में जन्म लेने वाला वह व्यक्ति हर दिन की भांति दीवारों पर अपने आस-पास की गतिवधियों को अंकित कर रहा था कि अचानक इनके सबसे बड़े भाई ने उनको यह करते देख लिया और रमेश को समझाते हुए चित्रकार के जीवन की कठिनाइयों को वर्णित करते चले गये यह बात रमेश बिष्ट के घर कर गयी और उन्होंने भी अपने इस भाई की तरह चित्रकार बनने की ठान ली। इनके बड़े भाई कोई और नहीं बल्कि प्रसिद्ध चित्रकार *रणवीर सिंह* बिष्ट थे।
जब बचपन से ही कोई व्यक्ति अपने इर्द-गिर्द की चीजों को आकार देने लगे तो कला उसके मन मस्तिष्क में बैठ जाती है और समय के साथ-साथ यह ज्ञान मीमांसा विस्तृत आकार भी ले लेती है। समकालीन वरिष्ठ मूर्तिकार बिष्ट जी कहते हैं कि कला की दुनिया में कोई भी अवधारणा या विचारधारा एक सी नहीं रहती यह कला की परिपक्वता से बदलती रहती है जैसे की जब मैं अपने गांव के आस-पास के जानवरों को अंकित करते - करते स्कूल से कॉलेज और कॉलेज से लखनऊ कला महाविद्यालय गया तो मेरी कला के प्रति अवधारणा बदल गयी और मैं बनने गया था चित्रकार और रास आ गया मूर्तिकार और मूर्तिशिल्प में मेरा कदम आगे बढ़ गया । फिर क्या था दिल्ली आ गया और यहां से कई बार देश-विदेशों की यात्रा की और मेरी अवधारणा के साथ-साथ विचारधारा में भी परिपक्व बदलाव आये।
यह कुशल मूर्तिकार इस और भी इशारा करते हैं कि जब यथार्थ जगत कला का अंग बन जाता है तो उसे अनेक प्रक्रियाओं और प्रतिक्रयाओं से गुजरना पड़ता है। बिष्ट जी के कहने का अभिप्राय यह है कि यथार्थ को कलाकारों की नजर से भी देखा जाना चाहिए, इस मूर्तिकार का रचना संसार प्रकृति की धूपछांही परिवेश में फैला यथार्थ रूप है। जिसमें गाय, बकरी, बाघ आदि कई तरह के जानवरों और मानव आकृतियों वाले भावों से भरे शिल्प नजर आते हैं । रमेश बिष्ट के शिल्प भावों के साथ-साथ गतिशील होते हैं जो कि उनको सजीव, मर्मस्पर्शी व संजीदा बनाते हैं। यह बात मैनें उनके शिल्पों देखकार महसूस भी की, यही एक परिपक्व चित्रकार और मूर्तिकार की विशिष्टता भी होती है। सुना था आकृतियां बोलती हैं पर रमेश बिष्ट के बोलते शिल्प प्रेक्षक से बात भी करते हैं। समकालीन मूर्तिकार रमेश के बेजुबान जानवरों के गतिशील मूर्तिशिल्प को देखकर दर्शक की आंखें नम हो जाती हैं अत: आप अंदाज लगा सकते हैं कि किस तन्मयता से इनको रचा गया होगा।
बिष्ट जी जिस तन्मयता से अपने शिल्पों को आकार देते हुए सजग रहते हैं उतना ही भारतीय मूर्तिशिल्प को लेकर भी काफी सजग हैं एक बातचीत के संदर्भ में वह अजंता एलोरा से लेकर देश-विदेश के कई तरह के मूर्तिशिल्पों के बारे में समझाते हुए बताते हैं कि जहां तक मूतिश्ल्पि का संदर्भ है, भारतीय मूर्तिशिल्प की एक समृद्ध परंपरा रही है और आज भी मूर्तिशिल्प की विविध विधाओं में विविध प्रकार का गंभीर और मूल्यवान काम रचा जा रहा है जो संसार की किसी भी शिल्प परंपरा से तुलनीय है इस संदर्भ में वह एक निवेदन करते हैं कि भारतीय मूर्तिशिल्प का एक आयाम है जो अजंता एलोरा आदि में देखा जा सकता है भारतीय शिल्पकारों ने इसे अपनी समृद्ध परंपरा से, अपने आत्मवादी दर्शन और गहन चिंतन से रचा है। बात को आगे बढ़ाते हुए वह माइकल एंजलो से लेकर कई बहुआयामी कलाकारों का जिक्र करते हुए शिल्पों की स्थुलता, गतिशीलता, सुंदरता और जीवंतता की बारीकियों को बताते हैं उनकी यह ज्ञान मीमांसा उनके कामों में भी परिलक्षित होती है जोकि एक कलाकार के लिए अहम और उपयोगी होती है। अपनी इन्हीं खूबियों से देश-विदेश में अपनी विशिष्ट पहचान रखने वाले समकालीन आधुनिक वरिष्ठ मूर्तिकार रमेश बिष्ट कोरोना काल में भी लगातार काम करने के लिए कला के प्रति प्रतिबद्ध है। उनके इस काल के काम को जल्द की हम एक बड़ी चित्र प्रदर्शनी में देखेंगे जिसका कला जगत में व हम सभी को इंतजार भी है। साभार ; जयप्रकाश त्रिपाठी, वरिष्ठ सीनियर आर्टिस्ट, कला समीक्षक एवं आर्ट डायरेक्टर (राष्ट्रीय सहारा हिन्दी दैनिक)




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