अभिव्यक्ति की सशक्त विधा है झोड़ा चांचरी
‘झोड़ा चांचरी’ कुमाऊं लोक साहित्य की सबसे लोकप्रिय विधा है। ‘झोड़ों’ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह किसी व्यक्ति विशेष की रचना नहीं होती हैं, बल्कि कई व्यक्ति किसी भी विषय को लेकर एक लोकगीत की रचना कर लेते हैं जिन्हें जोड़ कहा जाता है। कई लोगों का जोड़ एक ‘झोड़े’ को जन्म देती है। जो बात अन्यत्र नहीं कही जा सकती, ‘झोड़े’ के माध्यम से एक सामूहिक स्वर में अधिक स्पष्ट रूप से कही जा सकती है।
लोक साहित्य और संस्कृति किसी भी समाज का प्रतिबिम्ब होती है। बिना लोक संस्कृति को जीवित रखे उस समाज में रचनात्मक ढांचे को समझना कठिन हो जाता है। सच तो यह है कि किसी भी समुदाय को संगठित रूप प्रदान करने के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि उसके सांस्कृतिक परिवेश को उचित सम्मान देते हुए राष्ट्र की मुख्य धारा से जोड़ा जाए।
वास्तव में सांस्कृतिक कायरें से बनी एकता ज्यादा स्थाई और सुदृढ़ होती है। इस संबंध में कुमाउंनी लोक साहित्य भी अपवाद नहीं है। जब लोक साहित्य की बात आती है तो ‘झोड़ा’ इसकी सबसे सुदृढ़ अभिव्यक्ति है। ‘झोड़ा’ कुमाऊं लोक साहित्य की सबसे लोकप्रिय विधा है। जिसमें गोल घेरे में स्त्री-पुरुष खड़े होकर लोक गीतों को गाते हैं। चैत्रा मास तक रात-रात भर गांवों में यह लोकप्रिय ‘झोड़े’ गाये जाते हैं। कुमाऊं में स्याल्दे-बिखोती के नाम से लगने वाले लोकप्रिय मेले में द्वाराहाट में इन झोड़ों का समापन हो जाता है। ‘झोड़े’ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह किसी व्यक्ति विशेष की रचना नहीं होती है, बल्कि कई व्यक्ति किसी भी विषय को लेकर एक लोकगीत की रचना करते हैं। जिन्हें ‘जोड़’ कहा जाता है। कई लोगों का जोड़ एक ‘झोड़े’ को जन्म देता है।
‘झोड़े’ कई प्रकार के होते हैं। लेकिन मुख्य रूप से धार्मिक, भावमूलक एवं समसामयिक ‘झोड़े’ यहां गाये जाते हैं। जिनमें धार्मिक आस्था एवं मनोरंजन के साथ-साथ आज की राजनीतिक जागृति एवं विकास के बारे में जोरदार कटाक्ष भी होता है। धार्मिक ‘झोड़े’ में ईर से समस्त मानव जगत के कल्याण की प्रार्थना की जाती है। धार्मिक झोड़े में एक स्थान विशेष पर देवी-देवताओं की स्तुति की जाती है। एक धार्मिक ‘झोड़े’ में मां भवानी की स्तुति गायी गयी है। जिसमें लोकगीतों के मायम से माता से अपने धर्म द्वार खोलने की प्रार्थना की गयी है। इस झोड़े के बोल हैं-
ओ हो खोल दे माता, खोल भवानी धरमा के वाड़ा
हौली गंगा-भागीरथी को के भलो रेवाड़ा
ओ हो क्ये ल्यै रैछे भेंट, पखोवा, के खोलुं किवाड़ा
आज धार्मिक ‘झोड़े’ बहुत कम सुनने को मिलते हैं अब तो विशेष पर्व पर ही इन्हें गाया जाता है। भावमूलक झोड़े का उद्देश्य एक मनोरंजन का वातावरण बनाना होता है। जिसमें गायकों द्वारा विभिन्न श्रृांगारिक प्रसंगों को लेकर ‘झोड़ों’ की रचना की है। इसमें प्रेमी-प्रेमिकाओं के प्रसंगों को लेकर सबसे अधिक तुकबंदी की गयी है जो श्रंगार-रस से युक्त अभिव्यक्ति होती है वह बड़ी प्रशंसनीय है। भावमूलक ‘झोड़ों’ को विरह को भी अधिक स्थान मिला है। जिसमें प्रेमी-प्रेमिका में विछोह पर भी लोकगीतों का निर्माण हुआ है। जिसमें मानवीय भावनाओं की गहराइयों की अधिक अभिव्यक्ति हुई है। चूंकि भावमूलक ‘झोड़ों’ का उद्देश्य मनोरंजन है अत: इसमें हास-परिहास को ही ज्यादा स्थान मिला है। भावमूलक झोड़ों को सुनकर दिनभर की थकान व तनाव दूर हो जाता है। भावमूलक ‘झोड़े’ के बोल-
माया न्हैगे मोटर मां भैबेरा,
लौंडा मोहना के कर छै कबेरा।
.......
चेली लछिमा सेंटर न्है गोछौ पाली,
लौंडा मोहना पेपर न्है गोछौ खाली।
समसामयिक ‘झोड़ों’ में सामाजिक एवं राजनीतिक परिवर्तनों के साथ-साथ विकास कायार्ें की प्रगति, नेताओं एवं प्रशासनिक अनियमितताओं संबंधित विषयों पर झोड़ों का निर्माण किया जाता है। जहां इन झोड़ों में सामाजिक कायार्ें की प्रशंसा की जाती है वहीं सरकार द्वारा बरती गयी उपेक्षापूर्ण नीति पर भी विरोधी स्वर दिये गये हैं। विभिन्न समयों पर समाज पर हो रहे गलत कायार्ें को खुलकर इन झोड़ों के माध्यम से कोसा गया है। सामयिक झोड़ों में पहाड़ में चले विभिन्न आंदोलनों का उल्लेख भी किया गया है। वन अधिनियम को पहाड़ में लागू करने तथा पेड़ों की अवैध कटाई या फिर उत्तराखंड राज्य आंदोलन में जनता को जागृति करने के लिए भी ‘झोड़ो’ं का प्रयोग किया गया । उत्तराखंड में पर्यावरण के प्रति चिंता प्रारंभ से ही रही है। पेड़ों को बचाने का संदेश पहले से ही ‘झोड़ों’ के मायम से हमें मिलता रहा है। एक ‘झोड़े’ में महिलाओं से कहा गया है कि इन सरकारी जंगलों को बचाने की जिम्मेदारी हमारी है। इसलिए इन ‘बांज’ और ‘बुरांस’ के जंगलों को मत काटो। जैसे-
सरकारी जंगल लछिमा, बांज न काटा लछिामा बांजा न काटा।
यूं हमारा धुर जंगला, नाशा ना कर लछिमा नाशा नि करा।।
इस प्रकार ‘झोड़ा’ लोकगीत यहां की न केवल सांस्कृतिक धरोहर है, बल्कि अभिव्यक्ति की एक महत्वपूर्ण विधा है।



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