एक यात्रा ऐड़ाद्यो धाम की

जग जाहिर है कि उत्तराखंड को देवभूमि के नाम से जाना जाता है। यह कई मनीषियों की तपोभूमि रही है। यहां से अध्यात्म की जो गंगा निकलती है वह जनकल्याण के साथ आगे बढ़ती है। धार्मिक स्थलों के अलावा कई तपस्वियों की साधना स्थली पर लोगों का अटूट विास है। ऐसी ही एक तपस्थली है ‘एड़ाद्यो।’ सोमेर के नजदीक और अल्मोड़ा जनपद के हवालबाग विकास खंड में स्थित यह मंदिर आस्था और विास का एक ऐसा केन्द्र है जहां लोग बार-बार आना चाहते हैं। एड़ाद्यो एक ऐसे रमणीक स्थान पर बसा है। जहां हम अध्यात्म के साथ प्रकृति के उस आगोश में समा जाते हैं जहां आत्मिक शांति और परोपकार की चेतना स्पफुटित होती है। इसकी कई सारी वजहें हैं। एक तो एड़ाद्यो को प्रकृति ने अपने हाथों से सजाया है, दूसरा यहां तपोलीन हुए श्री श्री 108 महादेव गिरि जी, जो मानव कल्याण के सच्चे प्रतिनिधि थे, उन्होंने अपनी साधना और चेतना से एक बड़े समाज को आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।

ऐडाद्यो तपोभूमि की कहानी बहुत ही दिलचस्प है। बताया जाता है कि श्री श्री 108 महादेव गिरी के गुरु श्री श्री 108 दौलत गिरी जी महाराज थे। उनका आश्रम दुधेर महादेव गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश में था। महाराज जी को अपनी तपो शक्ति से ज्ञात हुआ कि ऐड़ी मंदिर, जिसे हम ऐड़ाद्यो धाम के नाम से जानते हैं, के निकट भूमि पर शिव प्रतिमा विद्यमान है। महाराज जी 1936 में ऐड़ी मंदिर के निकट ही एक बांज वृक्ष के खोखले में तपोलीन हो गये। महाराज जी की अद्भुत शक्ति देख क्षेत्रावासी उनके भक्त हो गये और धीरे-धीरे वहां पर मंदिर का निर्माण शुरू हुआ। जो आज एक भव्य मंदिर का रूप ले चुका है। महाराज श्री महादेव गिरी जी की शक्ति और भक्ति का आभास होने पर अंग्रेज डीएफओ भी उनके भक्त हो गये तथा आश्रम निर्माण के लिये वन भूमि महाराज को दे दी।


एड़ाद्यो में आश्रम बनने के बाद यह स्थान लोगों की अध्यात्मिक और धार्मिक गतिविाियों का केन्द्र बन गया। यहां बड़ी संख्या में लोग आने लगे। महाराज उन्हें अपनी विद्वता औरस्नेह से उपकृत करने लगे। धीरे-धीरे महाराज जी ने धर्म प्रचार के लिए भागवत करने शुरू किए जो गुरु जी की कृपा से आज भी अनवरत जारी है और यज्ञ की पूर्णाहुती भाद्रमास के कृष्णपक्ष पंचमी को होती है। जिससे प्रभावित होकर आज भी आसपास के गांवों के लोग अपने-अपने घरों, मंदिरों और सार्वजनिक स्थानों पर भागवत जैसे यज्ञ करने को हमेशा तत्पर रहते हैं। कहीं भी इस प्रकार के यज्ञ होने पर बढ़-चढ़ कर अपना सहयोग देते हैं। महाराज जी की ही कृपा से आस-पास के विभिन्न शिवालयों-मंदिरों में भगवत कथा और शिवपुराण के आयोजन होते थे। जिसके माध्यम से पूरे क्षेत्र के लोग जुड़ते हैं और आपसी सद्भाव, भाईचारे और क्षेत्र के विकास के प्रति सजग रहते हैं। इस तरह के आयोजन हमारी एकता और सांस्कृतिक परंपरा को आगे ले जाने में भी सहायक हो रही हैं।    


सांस्कृतिक और धार्मिक कायरे के माध्यम से लोगों को जोड़ने की इसी कड़ी को आगे बढ़ाया श्री 108 महाराज देवनारायण गुरु जी ने। देवनारायण जी 1936 में पैदा हुए और एक वर्ष पश्चात ही प्रज्ञाचक्षु होने के कारण परिजनों ने उन पर विशेष ध्यान नहीं दिया। सत्रह वर्ष की आयु में प्रज्ञाचक्षु बालक को नागा बाबा श्रीश्री 108 महादेव गिरी महाराज ने चक्रवतेर देव महादेव मंदिर में योग शिक्षा देकर संत बनाया। यह बालक बाद में श्रीश्री 108 नारायण गिरी महाराज के नाम से विख्यात हुए।


श्रीश्री 108 देव नारायण गिरी महराज पर ईरीय कृपा ऐसी बरसी कि वो जिनकी आवाज एक बार सुन लेते थे तो उसे कभी भी नहीं भूलते थे। कभी भी कहीं भी मिलने पर उस व्यक्ति को बोलते ही उसे नाम लेकर बुलाते थे। गुरु महादेव गिरी महाराज ने इन्हें चक्रवतेर मंदिर में साधना का अभ्यास कराया वहीं पर इन्होंने संस्कृत तथा संगीत का ज्ञान अर्जन किया। कुछ ही समय में श्रीश्री 108 गुरु महाराज देवनारायण गिरी महाराज संस्कृत एवं संगीत में पारंगत हो गये। महाराज को अधिकतर मंत्रा, अराधना, पूजा के सभी मंत्र कंठस्थ्य थे। वह अपने दिव्य चक्षु से सब कुछ देख लिया करते थे।

नागा बाबा श्रीश्री 108 महादेव गिरी महाराज के समाधिष्ठ होने के बाद आपने ऐड़ाद्यो तपोभूमि पर साधना की तथा गुरु व गुरुस्थान की ख्याति चारों और बिखेरने का बीड़ा उठाया। कुछ ही समय में महाराज जी के अनेकों भक्त हो गये। महाराज जी भक्तों की भावनाओं को समझते थे कि भक्त किस भाव से आ रहा है या पुकार रहा है। जो महाराज जी को नि:स्वार्थ भाव से पुकारते थे या महाराज जी के पास जाते थे तो भक्तों के कष्ट स्वत: ही दूर हो जाते थे।

महाराज जी द्वारा इस पूरे क्षेत्र में काफी मंदिरों का जीर्णोधार किया गया। जिसमें मुख्य रूप से द्वाराहाट विकासखंड के अंतर्गत बासुलीसेरा स्थित फुलकेर महादेव मंदिर एक जीता जागता उदाहरण है। महाराज जी की देख रेख मे फुलकेर महादेव मंदिर में बनाये गये विशालतम हवन कुंड, कथा वाचन के लिए विस्तृत प्रांगण, मंदिर और धर्मशालाएं हैं। इसी प्रकार जागरी गोल में स्थित दिव्येर महादेव मंदिर का जीर्णोधार भी महाराज जी ने करवाया। जहां पर एक नया आश्रम तथा भव्य मंदिर समूह में विद्यमान हैं। महाराज जी ने ही कोटभ्रामरी, कपिलेर, काफलीगेर, कफड़ा, चौखुटिया, मैच्यूला, कुंवाली इत्यादि जगहों पर डेढ़ सौ से दो सौ किलोग्राम तक के घंटे चढ़ाये गये।

महान योगियों का जीवन तो विलक्षण होता ही है उनके जाने के बाद भी उनकी प्रेरणा हमेशा लोगों के साथ बनी रहती है। इस तरह के योगियों को अपने जीवन और मृत्यु के बारे में भी आभास हो जाता है। यही वजह है कि महाराज को भी अपनी मृत्यु का आभास हो गया था। उन्होंने 8 मई, 2008 के प्रात: काल में महाराज जी ने अपने भक्तों को समाधि स्थल तैयार करने को कहा। जीते शरीर में शिष्यों ने समाधि स्थल तैयार नहीं किया। उसी दिन सायं साढ़े पांच बजे महाराज जी ने अपना शरीर छोड़ दिया। और दिनांक 9 मई, 2008 को अपने ही गुरु महाराज के निकट समाधिवश हो गये।

इस प्रकार के तपस्वी आज भी देवभूमि में हैं। मनुष्य के जीवन में कुछ क्षण ऐसे होते हैं जब उसकी बुद्धि निर्मल और सात्विक रहती है। उन क्षणों में किये हुए कर्म शुभकामनाओं से युक्त एवं पुण्य बढ़ाने वाले होते हैं। पर सामान्यत: काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, ईष्र्या, दंभ, राग, द्वेष आदि दुगरुणों से वशीभूत मानव का अधिकतर समय पापाचरण में ही बीत जाता है। जिसे वह स्वयं नहीं समझ पाता। 

श्रीश्री 108 देव नारायण गिरी महराज जी के बाद ऐड़ाद्यो का कार्यभार दक्षिणी कैलाश के गुरु नागा बाबा 108 त्रिवेणी गीरी थानापति जी ने संभाला। पर जल्द ही वह भी समाधिवश हो गये। उनके बाद ऐड़ाद्यो मंदिर का उत्तराधिकार श्री महंत बिशंभर गीरी जी महाराज जी द्वारा संचालित व व्यवस्थित किया जा रहा है।


-स्रेत: पूर्व प्रानाचार्य श्री महादेव गिरी संस्कृतातकोत्तर महाविद्यालय के लेख से


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